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फिक्स्ड डिपॉजिट पर अग्रणी बैंकों द्वारा दी जाने वाली ब्याज दर में करीब दो फीसद की आई गिरावट

पिछले एक साल में, फिक्स्ड डिपॉजिट पर अग्रणी बैंकों द्वारा दी जाने वाली ब्याज दर में करीब दो फीसद की गिरावट आई है। इससे एफडी के प्रति निवेशकों का आकर्षण कम हो रहा है। ऐसी स्थिति में एक्सपर्ट्स कॉरपोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करने की सलाह देते हैं। कॉरपोरेट एफडी में बैंक एफडी की तुलना में 2 फीसद तक अधिक ब्याज दर का फायदा लिया जा सकता है।

हालांकि, कोरोना वायरस महामारी जनित वित्तीय तनाव के चलते कॉरपोरेट बैलेंस शीट्स भी तनाव में हैं। इसलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि कॉरपोरेट एफडी में निवेश के दौरान व्यक्ति को सलेक्टिव रहना चाहिए। विशेषज्ञ पूंजी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निवेशकों को केवल एएए रेटिंग वाली कॉरपोरेट एफडी में निवेश की सलाह देते हैं। इस समय एएए रेटेड कॉरपोरेट एफडी निवेश अवधि के आधार पर 6 से 8 फीसद के बीच ब्याज दर की पेशकश रही है।

मॉर्गेज लेंडर एचडीएफसी इस समय 15 महीने की अवधि वाली एफडी पर 6.20 फीसद ब्याज दर की पेश कर रहा है। वहीं, बजाज फाइनेंस 12 से 23 महीने की अवधि वाली एफडी पर 6.9 फीसद ब्याज दर की पेशकश कर रहा है। ये दोनों ही कॉरपोरेट एफडी एएए रेटिंग के साथ आती हैं। इसका मतलब है कि इसमें आपकी पूंजी की सुरक्षा सबसे अधिक है।

कॉरपोरेट एफडी ग्राहकों से अधिक ब्याज दर की पेशकश तो करती है, लेकिन यहां प्रीमैच्योर निकासी के नियम बड़े कड़े होते हैं। कॉरपोरेट एफडी में जमा के पहले तीन महीनों में प्री-मैच्योर निकासी की अनुमति नहीं होती है। पहले तीन महीनों के बाद भिन्न-भिन्न कंपनियां प्री-मैच्योर निकासी पर अलग-अलग शुल्क लेती है। उदारण के तौर पर एचडीएफसी लिमिटेड तीन महीने के बाद और छह महीने से पहले प्री-मैच्योर निकासी करने पर केवल तीन फीसद ब्याज ही देती है। छह महीने के बाद प्री- मैच्योर निकासी पर एचडीएफसी अवधि के लिए लागू ब्याज दर से एक फीसद कम ब्याज दर का भुगतान करता है।

क्या है कॉरपोरेट एफडी

कॉरपोरेट डिपॉजिट किसी बैंक की बजाय कंपनी द्वारा जारी की जाती है। इनकी मैच्योरिटी अवधि आमतौर पर छह माह से तीन साल तक की होती है। यहां ब्याज दर बैंक एफडी की तुलना में अधिक होती है। कॉरपोरेट एफडी में जोखिम बैंक एफडी की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि ये कंपनियों के कारोबार से जुड़ी होती है। हालांकि, अधिक रेटिंग वाली कॉरपोरेट एफडी में जोखिम कम रहता है निवेशक की पूंजी की सुरक्षा बढ़ जाती है।

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